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रविवार, 22 फ़रवरी 2015

अपनो छोटो सो घरगूला.....

हिराने अंगना 
बिसरे चूल्हा
कहाँ डरे अब
बरा पे झूला
भूले चकिया
सूपा, फुकनी
नहीं दिखे ढिग
छुई की चिकनी
ओझल भये
गेरू के फूल
गाँव गलिन की 
गुईयाँ संगे 
सजा लओ 
सबने अपनों 
छोटो सो घरगूला.....

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

कहाँ गए तुम्हारे सामुद्रिक संस्कार???

.....
हे उद्दात लहरों ...
कौन भड़काता है तुम्हे
कौन सिखाता है तुम्हे
क्यों ठेस पहुंचाती हो
क्यों ख़ुदको छलती हो
क्या यही सभ्यता है
क्या यही परंपरा है
कहाँ गए तुम्हारे मर्यादित
सामुद्रिक संस्कार???
यह कैसा अधिकार
क्यों न तुम्हें बांध दिया जाए
बंधनों की बेड़ी से 
वह भी बिल्कुल अकेले
फिर खूब चीख़ना - चिल्लाना
सवाल करना ख़ुद से
और जवाब भी देना
देखना निरूत्तर हो जाओगी
क्योंकि मर्यादाओं को तोड़ना
बंधनों को तोड़ने से कहीं अधिक
मुश्किल और कठिन है...

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

आंखर चाय...


शब्दों की भीनी मिठास
भावों की महक को
जब शृंगार के जल में
व्याकरणी दूध खौलाकर
डबकाते होगें कुछ देर
तो कविता सी 
बनती होगी चाय उनकी
ताज़गी से भरपूर  
दार्जलिंगी गमक लिए
महकते शब्दों को 
जायकेदार ख़ुश्बू संग
खूब खौलाते हैं 
बड़ी शिद्दत से वो 
जैसे चाय नही पक रही 
कोई कविता उबल रही हो
उबलेगी, खौलेगी, छनेगी 
फ़िर प्रस्तुत की जाएगी 
प्यालियों रकाबियों में \
किताबों की तरह
व्यवस्था परिवर्तन के लिए
क्रांति का उद्घोष करती...