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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हर आने वाली सुबह है नया साल...

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कारवां जीवन का चलता यूं
दिन ढलता, रात, फ़िर सुबह
झट उनींदी सी आँखें मलते 
समेटकर बिखरे-बिखरे बाल 
रोज़ जिस वक़्त जागते सब 
साड़ी के पल्लू से कमर कसे 
चल देती रचने एक अध्याय  
जीत लेती रोजमर्रा की जंग 
जारी है   ज़िन्दगी का सफर 
ख़ुशी से अपनी धुन में मस्त 
कुछ खट्टे कुछ मीठे से पल 
काव्य हो जाते शब्दों में ढल 
कभी कविता तो कभी नज़म 
हर दिन एक जीत सा जीवन
गुज़रा दिन बन जाता पिछला 
आने वाली सुबह है नया साल ...

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

सम्मोहन ...

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अनंत सागर के
खारे पानी में
अकेली खड़ी वह 
हर क्षण धीरे-धीरे  
घुलती जा रही है 
सांसें रुकने को हैं, 
जैसे-जैसे डूबती है 
सागर की लहरों में
विश्वास और ढृढ़ होता
गहरे खींचता है उसे 
अभिमानी, उद्दंड
पर उसकी भी जिद्द है
जीत कर ही मानेगी
सागर की विशालता
जितना डराती हैं
उतना ही उसकी ओर 
खिंची चली जाती है 
उद्दात लहरें 
आवाज़ देती हैं उसे 
हर बार बहा ले जाती हैं 
बहुत कुछ उसका 
सब लाना है वापस उसे 
वह अच्छी तरह जानती है
यह प्रलय नही है 
सिर्फ सम्मोहन है 
कुछ-कुछ मृत्यु जैसा

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

बोलने लगते हैं चेहरे ....

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मुखौटों के पीछे 
बरसो से मौन 
सहमे से बेजान
सिर्फ ढलते ही हैं 
जिनके सूरज    
एक ना एक दिन
झूठ से तंग आकर 
सच की सांस पाकर
खिल उठते हैं 
सुबह की धूप से   
और फिर हौले से 
बोलने लगते हैं चेहरे ...