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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

सूर्योदय होगा...संध्या शर्मा

जानती हूँ मैं
जो भी घटा
पहली बार नहीं
सदियाँ हो गई घटते
ज़ुल्म सहते-सहते
फिर भी आशान्वित हूँ
विपरीत परिस्थितियों में
यातनाओं से डरी नहीं हूँ
बहुत खुश हूँ आज
चिंगारी एक सुलगती दिखी है
हजारो युवा आँखों में मुझे
यही चिंगारी...

एक किरण बनेगी
हर साल की तरह
इस साल की सुबह 

अँधेरा नहीं लाएगी
एक किरण जगमगाएगी
आशा जाग उठी है
कल दूर अँधेरा होगा
नया सूर्योदय होगा...

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

प्रीतनिया.... संध्या शर्मा

 
गीत नया क्या गाऊं साथी
छेड़ूँ क्या वीणा पर तान
क्रंदन उर की हर धडकन में
पीड़ा होती प्रबल महान

 
छूटी लय,ताल बिखरी है 
बिसरा सकल सुरों का भान
मेरे मन के राग राग से
कैसे हो अबतक अनजान

उपमाएं तुम ही मेरी हो
तुम ही मेरे हो उपमान
तुम बिन कैसे मैं पर खोलूं
तुम बिन कैसे भरूं उड़ान
 
तुम उषा की स्वर्णिम आभा
तुम बिन मैं दिवस की सांझ
बेकल मन क्यों तुमको चाहे
क्यों तुममे बसते हैं प्राण

हिरण्यगर्भ सुरभित सुमन
निसदिन संचित नेह सुजान
सुर ताल लय मृदंग किंकणी
तेरी बाट तके है नित मान

रविवार, 23 दिसंबर 2012

अंतर्द्वंद...संध्या शर्मा


क्या बताओगे 
आने वाली पीढ़ी को
कि
सिर्फ दिमाग लेकर ही
पैदा हुआ था
आज का इंसान
दिल नहीं था
इसके पास
निज स्वार्थ के आगे
मानवता भी भूला
द्वंद्व है मन के अंदर
सच कहूं तो
अपनी हालत पर
दया से ज्यादा
गुस्सा आता है
जो आज
अपने आप से ही
मुंह छुपाता
फिर रहा हो
जो खुद को
निरन्तर छल रहा हो
जिसके पास
आज के लिए जवाब न हो
कल को क्या जवाब दे पायेगा....

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

जीवन चदरिया...संध्या शर्मा

मन मेरा कह रहा है
एक जीवन चदरिया बुनूं
बुन सकूंगी क्या इसे??
जितना सोचा था आसान
उतना ही कठिन लग रहा है
कैसे डालूं ताना-बाना
एक - दो कि सारे धागे लूँ
बिना गांठ के धागे चुन लूँ
कितना सोचना पड़ रहा है
किसे रखूं किसे छोडूं
सारे ही इकठ्ठे कर लिए हैं
पहला धागा वात्सल्य का.... 
बड़ा ही कोमल सा है तार
यह सोच के रख लिया है
कोमलता रहेगी बरक़रार
एक तार मैत्री का बुन लिया
ताना-बाना लेने लगा आकार
लेकिन बुनाई  अब भी शेष है
आशा , सुख और आनंद के
तार भी सुनहरे मिला दिए
अब चदरिया घनी हो रही है
फिर भी कुछ कमी सी है
एक तार प्रेम का जोड़ लिया
सुन्दर बहुत है नाज़ुक सा
चदरिया को नया बाना मिला
यश, कीर्ति और अस्तित्व ने
इसे एक सुन्दर उद्देश्य दिया
सभी बड़े सुन्दर प्रसन्न
फिर भी मन था खिन्न
कुछ तार चुपचाप पड़े थे
सोचा इनमे से भी कुछ चुनुं
इन्हें भी चदरिया में बुनूं
एक तार निराशा, अपयश का
पराजय, दुख का एक -एक तार,
इन चारो को एक साथ बुनते ही
चदरिया ने पाया अपना रूप
दुःख बिना कैसा सुख है
आशा बिना निराशा कैसी
अपयश बिना यश कैसा
हार बिना जीत है कैसी
सबकी अपनी अपनी ठांव
ज्यूँ चन्दन वन का गाँव
पूरी हुई ये जीवन चदरिया
ज्यूँ जेठ की धूप संग
छाई आसाढ़ बदरिया ......

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

एक बूँद ज़िन्दगी... संध्या शर्मा


एक आंधी का इंतज़ार है 
एक तूफ़ान की ख्वाहिश है
झुकी आँखें राह तकती हैं
धुंध है, ओस बिखरी सी है
आँखों में कुछ नमीं सी है
बीते पल की भीनी खुशबू
पलकों पर बूँद बनकर
आज थमी - थमी सी है
वक़्त ने सिफारिश की है
ख़ुशी हासिल करने की
एक आजमाइश सी है
दो बूँद भी तो काफी हैं
एक जिंदगी के लिए
एक तुम बरसा दो
एक मैं छलका दूँ ....

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

ये जीवन है???... संध्या शर्मा




हर रोज बैठे रहते हैं अकेले
कभी टी वी के निर्जीव चित्र देखते
कभी मोटे चश्मे से अखबार छानते
एक वक़्त था कि फुर्सत ही न थी
एक पल उसकी बातें सुनने की
आज कितनी याद आती है वह
वही सब मन ही मन दोहराते
बीच-बीच में नाती से कुछ कहते
क्या कहा कोई सुनता नहीं
अभी - अभी बहु ने गुस्से से
ऐसे पटकी चाय की प्याली
फूटी क्यों नहीं वही जानती होगी
बेटों ने ऐसे कटाक्ष किये कि
जख्मों पर नमक पड़ गया 
तन-मन में सुलगती आग
फिर भी गूंजी एक आवाज़
"बेटा शाम को घर कब आएगा"
ठण्ड से कांपता बूढ़ा शरीर
सिहर उठता है रह-रह कर
अपनी ही आँखों के आगे 
अपने शब्द और अस्तित्व
दोनों को  धूं -धूं करके

गुर्सी की आग में जलते देख
जो उड़कर बिखर रहे हैं 
वक़्त क़ी निर्मम आंधी में
कागज़ के टुकड़ों क़ी तरह...

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

जीवन एक किताब ... संध्या शर्मा


जीवन एक किताब
अधूरी सी ..........
आने वाला हर दिन
एक कोरा पन्ना
हर दिन लिखती हूँ
भावों की इबारतें
कभी भरती हूँ
आशाओं की सरिता
प्रवाहों के बीच पड़े
बड़े-बड़े पत्थर
उनपर जमी
वक़्त की काई
साथ चलते दो किनारे
पेड़ों की घनी कतारें
डालियों पर गूंजता
पंछियों का कलरव 
सतरंगी किरणों को
पंखों में समेटे
फूल - फूल पर
मंडराती तितलियाँ 
भंवरों  का गुंजन
प्यारा सा गाँव
गुलमोहर की छाँव
रहट-रहट सी सांस
तिनका-तिनका आस
बैलों की रुनझुन
छप्पर-खलिहान
फूली सरसों
गमकते टेसू
बहती पुरवाई
उड़ती चूल्हे की राख
रंभाती गाय
मस्ती से उछलते बछड़े
बहती नदिया की
कल-कल धार
करती जीवन साकार
तो किसी पन्ने पर
पल्लू के कोने में बंधी
माँ की हिदायतें
कमरे से झाड़ी धूल
रसोई में पकते
खाने की खुशबू
चौकी-बेलन संग
खनकती चूड़ियों का
मिला-जुला राग https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgUxzKsTj2UTMvnC8X3ElPqAnA5c0ccj4HKbDIOGLjUPaWdwKTr6kqu8xmrsAwrg7sZrqp07_IvTunpM8cGkc_K6-ygVsTPQI3tYxv-QNIXlWSymAX-b1jBBesSh305ibBSVqNOx9NdQd0/s400/book+of+life.jpg
और भी न जाने
कितना कुछ है
अस्त-व्यस्त सा
समय कहाँ मेरे पास
सजाऊं-संवारूं इसे
मैं तो एक सैलानी हूँ  
अतीत-वर्तमान को
रोज समेटती हूँ
इन पन्नो पर 
समीक्षा के लिए
दे जाऊंगी समय को
उस दिन जब यह मेरी
जिल्द से लिपटी किताब होगी
तब यह सिर्फ मेरे नहीं
हर पढने वाले के हाथ होगी ........