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गुरुवार, 28 जून 2012

सिर्फ मुझे... संध्या शर्मा

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तुम्हारे नयन
बोलते हैं
सुनाई देते
सिर्फ मुझे...

तुम्हारा आना
श्रावणी फुहार
भिगोती है
सिर्फ मुझे...

तुम्हारा साथ 
बसंत जैसे
महकाता है
सिर्फ मुझे...

तुम्हारा रूप
गुलमोहर
सजाता है
सिर्फ मुझे...

तुम्हारा जाना
रूठा चाँद
सताता है
सिर्फ मुझे...

हमारा मिलन
प्रीत लहर
डुबोती है
संग-संग... 

मंगलवार, 19 जून 2012

बरखा ... संध्या शर्मा



https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhez6mJlIb0w0rL4nnNEtmVakAeRLPmKpvkhPzcPPDMQhW8UkXZgHpPvWkFGoqfkRuwWFBfL6awBipk3JyzIDA0YQWYd2Y4GbfSxK7dOxPJhOt9sssta-UmdhjmlS0NrOLZuNekYsPBq7OG/s1600/Woman+in+the+Rain.jpg

कब आऊं?
बरखा ने पूछा
जब इच्छा हो
मैंने कहा
कितना भी भीगो
सूखी ही रहोगी
वह मुस्कुराकर बोली
तुम सुनाने लगे कहानी
एक दिन....!
तुम और मैं साथ-साथ
बैठे थे जिस कागज़ की नाव पर
भिगो गई थी यह उसे
पलट गई थी वह
तब से बैर हो गया
तुमसे बरखा का
वह अलग बरसती रही
तुम अलग
मैं खड़ी रह गई
दोनों के बीच
सूखी नदी की तरह
उमस बढ़ी
अंतस तपता रहा
आज बीज बोने के बाद
स्वीकार कर पाए तुम उसे
बस इतना ही कह सके
कभी तो आएगी वह
राह देखेंगे मिलकर....

गुरुवार, 14 जून 2012

तलाश... संध्या शर्मा



प्रश्न - उत्तर 
समस्या - समाधान
उलझन ही उलझन
अस्तित्वहीनता
डरा सहमा मन
उबरने की कोशिश
लड़खड़ाते कदम
मन कुछ कहता है
और दिमाग कुछ
भटकता है
मन
कानन - कानन ...
मीलों नंगे पाँव
कंटीली, पथरीली राह
घायल क़दम
भागता मन
थका - थका सा
तभी....
देती है
सुनाई
एक आवाज़ 
यह तो है शुरुआत
ढल जाएगी रात
कुहासा छंट जायेगा
चलते चलो 
मंजिल होगी
तुम्हारे पास 
चमक उठती हैं
मन की आँखें
झलक जाती हैं
ख़ुशी से
मन धीरे से
कुछ कहता है...

और चल पड़ता है
दुगुने उत्साह से
बिना थके / बिना रुके
लम्बी रात
सी राह पर
तलाश में
एक सुनहरी सुबह की ...

गुरुवार, 7 जून 2012

सरोकार ...संध्या शर्मा

हम कोई पंछी नहीं
जो फुदकते रहे
डाल-डाल पर
चहकते फिरें
हर मुंडेर पर
चंद दानो के लिए

हम धर्मराज नहीं
जो फंस जाये
चक्रव्यूह में
और प्रतीक्षा करे
अभिमन्यु की
व्यूह भेदन के लिए 

हम कोई चारण नहीं 
जाएँ राजसभा में
गाएं विरदावली
ढोल बजाते हुए
किसी की शान में
तनिक कृपा के लिए


हम तो पत्थर हैं
उस नींव का
जो हिला दे
एक ही पल में
पूरी मंजिल को
अधिकार के लिए

सोमवार, 4 जून 2012

यादें...संध्या शर्मा



आज मिले फुर्सत के कुछ पल,
बक्सों में बंद यादों संग हो ली.

जीर्ण होती एक-एक परत,
बड़े ही जतन से खोली.

मैंने इनसे कुछ ना कहा,
ये मुझसे जीभर के बोली.

कितनी अकेली थी मैं,
जब ये यादें ना थीं.

आज जब पड़ा इनसे वास्ता,
लगा यही हैं मंजिल मेरी - यही रास्ता.

मैंने भी बना लिया इन्हें हमराज़,
हर परत में संजो कर अपना आज.

एक दिन ये खुशबू की तरह फैलेगी,
आज मौन है कल खूब बोलेगी.