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मेरी कविताएं
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मंगलवार, 18 नवंबर 2014
माँ.... !
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पंछी गूंगे हो गए चाँद-तारे खो गए जहाँ तक नज़र जाए ठूँठे से दरख़्त है मेरे बचपन का गाँव ज्यूँ काठ का हो गया जबसे आखि...
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सोमवार, 3 नवंबर 2014
काश !!!
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वो बुदबुदाती रहती है अकेली जैसे खुद से कुछ कह रही हो या दे रही हो, उलाहना ईश्वर को ?? स्वयं ही तो चुना था उसने पति के जाने ...
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सोमवार, 27 अक्टूबर 2014
धंधा (लघुकथा)
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"दीप … दीप … रुक जा बेटा ... " साईकिल पर मस्ती करता दीप, पीछे से अचानक आती कार और मेरा घबराकर उठ बैठना देखकर सुमित भी जाग ...
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सोमवार, 6 अक्टूबर 2014
मोक्ष...
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जब पढते हैं ॠचाओं को पौराणिक आख्यानों को याद आता है हमे भागीरथ का तप जब तुम्हें पृथ्वी उद्धार के लिए धरा पर उतारा गया था।...
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