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मेरी कविताएं
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बुधवार, 26 मार्च 2014
सत्ता सुख और लोककल्याण- अभी रोग दूर होना शेष है...
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लोककल्याण की आकांक्षा धारण किए विश्व इच्छा और कल्पना के भयानक युद्ध का अखाडा बना हुआ है. जब भी इच्छा और कल्पना के बीच संघर्ष होता है मनुष...
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शनिवार, 15 मार्च 2014
बिरज में होली रे कन्हाई …
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बिरज में आज होली रे भाई सखियों संग नाचे रे राधिका खेलत फाग अबीर हिलमिल ग्वालन संग कुवंर कन्हाई बिरज में आज होली रे भाई … ...
7 टिप्पणियां:
मंगलवार, 11 मार्च 2014
स्मृतियाँ
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यही है वह एकांत वही पेड़ और शाखाएं स्मृतियों की छायाएँ यहीं से उगा था चाँद प्रीत का यहीं मिले थे पहली बार ठीक उसी जगह जा पहुंचे जो जग...
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शनिवार, 8 मार्च 2014
ना जाने कब....??
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रसोई - घर- आंगन खेत - खलिहान चकरघिन्नी सी फिरती रहती है दिन भर वह जीवन सहेजने की कोशिश में खुद को निहारे वर्षों बीत गए तरुणाई की जगह कब...
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